एक लड़का था..
बहुत ही नेक और
होशियार था . पढ़ने में
भी काफी तेज था ..
एक दिन वो मंदिर में
गया ..
मंदिर के अन्दर
सभी भक्तो भगवान के
दर्शन
कर रहे थे और मंत्र बोल
रहे थे ..कुछ भक्त
स्तुतिगान भी कर रहे थे ..
कुछ भक्त संस्कृत के
काफी मुश्केल श्लोक
भी बोल रहे थे ..
लड़के ने कुछ देर यह सब
देखा और उसके चहेरे
पर
युही मायूशी छा गयी ..
क्युकी उसे यह सब
प्रार्थना और मंत्र
बोलना आता नहीं था ..
कुछ देर वहा खड़ा रहा और
कुछ उपाय खोजने
लगा ..
लड़के के चहेरे पर
मुस्कराहट छा गयी ..उसने
अपनी आँखे बंध की , अपने
दोनों हाथ जोड़े और
दस बार अ आ इ ई
(हिन्दीवर्णमाला) बोल
गया …
मंदिर के पुजारी ने यह
देखा उसने लड़के से
पूछा की ” बेटे तुम यह
क्या कर रहे हो , लड़के ने
पूरी बात बताई … “
पुजारी ने कहा की ” बेटे
भगवान् से इस तरह से
प्रार्थना नहीं की जा सकती ,
तुम तो अ आ इ ई
बोल रहे हो..”
लड़के ने उत्तर दिया की ”
मुझे प्रार्थना , मंत्र ,
गीत नहीं आते . मुझे सिर्फ
अ आ इ ई
ही आती है . प्रार्थना ,
मंत्र , गीत यह सब अ
आ इ ई से ही बनते है . में दस
बार अ आ इ ई
बोल गया हूँ . यह सब शब्द
में से भगवान अपने
लिए खुद प्रार्थना , मंत्र ,
गीत बना लेंगे..”
लड़के की बात सुनकर
पुजारी जी चुप हो गए .
उनको अपनी भूल
का अहेसास हुआ .. उन्होंने
लड़के की समझ
को स्वीकार किया..
बोध –शीख
प्रार्थना हदय को साफ
और निर्मल करती है ..
शब्दों का महत्व नहीं है –
भाव का महत्व है ..
नेक दिल से की हुई
प्राथना भगवान तक जरूर
पहुचती है ..
प्रार्थना के अन्दर जब
भाव मिल जाता है
तो भगवान् जरूर मिलते है..
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