** पँ. शिवप्रसाद त्रिपाठी 'आचार्य' **
मानव शरीर मेँ पेट का स्थान नीचे है , हृदय का ऊपर और मस्तिष्क का सबसे ऊपर ।
पशुओँ की तरह समान्तर रेखा मे नही है !!
मनुष्य तथा पशु के शरीर की रचना मेँ अन्तर तथा इनकी वृत्तियोँ (व्यवहार)
मेँ अन्तर का चित्रण करते हुए कहा गया है कि -->
मनुष्य शरीर मेँ मस्तिष्क का स्थान सबसे ऊपर है ,जिसका सम्पूर्ण शरीर पर नियन्त्रण रहता है।
पेट की इच्छाओँ पर तथा हृदय की अनुभूतियोँ पर भी मस्तिष्क का नियन्त्रण रहता है ।
मस्तिष्क ही मनुष्य और पशु मेँ अन्तर का मुख्य कारक है ।
पशु के शरीर मेँ मस्तिष्क ,हृदय और पेट समान्तर रेखा मेँ रहते हैँ ।
अतः उसकी क्रियाओँ मेँ ,चिन्तन , अनुभूति और भोग का एक ही स्तर है अर्थात्
पशु पेट की ,तथा शरीर जन्य भोग क्रियाओ पर आरुढ़ रहता है । इन क्रियाओँ के सम्मुख उसका मस्तिष्क
विवश और निरीह दशा को प्राप्त हो जाता है । इसी अवस्था को पशु या पशुता कहा जाता है ।
इस प्रकार मनुष्य मेँ चिन्तन प्रथम , अनुभूति द्वितीय और भोग तृतीय स्तर की क्रियाएँ होती हैँ ,
जबकि पशु मेँ भोग , अनुभूति , तथा चिन्तन समान स्तर की क्रियाएँ हैँ ।
यदि मनुष्य शरीर मे चिन्तन की प्रधानता न हो तो वह मनुष्य ही नहीँ है ।
"मनुष्य चिन्तन प्रधान होता है।" यदि किसी मनुष्य मेँ भोग तथा शारीरिक वासनाओँ की प्रधानता है तो वह
पशु है ।
(श्री रामवृक्ष बेनीपुरी के निबन्ध "गेहूँ बनाम गुलाब" पर आधारित )
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