Wednesday, 7 November 2012
Wednesday, 24 October 2012
सपनों का सागर
टूटकर सपनो की जंजीर बिखर गई
जो बनाई थी हमने वो तस्वीर बिखर गई
बिखरे टुकडो में उम्मीदों की किरण ढूंढ़ते है
मौत के अंधेरो में जिंदगी का सबब ढूंढते है
हवाओं ने रुख बदला तो अब कोई चाह नहीं
जहाँ चलना मुमकिन हो ऐसी कोई राह नहीं
हमारे होंसले जब कुछ यूँ सिमटने लगते है
सन्नाटो और अंधेरो में जब हम भटकने लगते है
न जाने कहाँ और किस दुनिया में हम खो जाते है
खुद को नहीं जान पाते ऐसे अजनबी हो जाते है
सोचते है कि हर ख्वाब को टूट जाना ही होता है
खिलने के बाद हर फूल को मुरझाना ही होता है
खुशबू से जो अपनी महकाता है और जीवन में रंग भरता है
मुरझाने के बाद उस फूल को कौन याद करता है
कुछ इसी अंदाज में हम खुद को समझा लेते है
सच की तस्वीर से ख्वाबो की धूल हटा लेते है
बस ऐसे ही शिकवो का दौर चला जाता है
फिर बिखरे टुकडो में एक खूबसूरत सपना नजर आता है
इस सपनो के सागर में हम फिर से उतर जायेंगे
पता नहीं खुद को फिर धोखा देंगे या किनारों को पा जायेंगे
जो बनाई थी हमने वो तस्वीर बिखर गई
बिखरे टुकडो में उम्मीदों की किरण ढूंढ़ते है
मौत के अंधेरो में जिंदगी का सबब ढूंढते है
हवाओं ने रुख बदला तो अब कोई चाह नहीं
जहाँ चलना मुमकिन हो ऐसी कोई राह नहीं
हमारे होंसले जब कुछ यूँ सिमटने लगते है
सन्नाटो और अंधेरो में जब हम भटकने लगते है
न जाने कहाँ और किस दुनिया में हम खो जाते है
खुद को नहीं जान पाते ऐसे अजनबी हो जाते है
सोचते है कि हर ख्वाब को टूट जाना ही होता है
खिलने के बाद हर फूल को मुरझाना ही होता है
खुशबू से जो अपनी महकाता है और जीवन में रंग भरता है
मुरझाने के बाद उस फूल को कौन याद करता है
कुछ इसी अंदाज में हम खुद को समझा लेते है
सच की तस्वीर से ख्वाबो की धूल हटा लेते है
बस ऐसे ही शिकवो का दौर चला जाता है
फिर बिखरे टुकडो में एक खूबसूरत सपना नजर आता है
इस सपनो के सागर में हम फिर से उतर जायेंगे
पता नहीं खुद को फिर धोखा देंगे या किनारों को पा जायेंगे
Sunday, 21 October 2012
मंजिल
हदे गमें हस्ती से गुजर क्यों नहीं जाते
जीना नहीं आता तो मर क्यों नहीं जाते
मंजिल को पाना है तो तूफ़ान भी मिलेंगे
डर अगर है तो कश्ती से उतर क्यों नहीं जाते
जीना नहीं आता तो मर क्यों नहीं जाते
मंजिल को पाना है तो तूफ़ान भी मिलेंगे
डर अगर है तो कश्ती से उतर क्यों नहीं जाते
जिंदगी का राज
चेहरे की हंसी से हर गम को छुपाओ
बहुत कुछ बोलो मगर कुछ न बताओ
खुद न रूठो कभी पर सब को मनाओ
यही राज है जिंदगी का बस जीते चले जाओ
Friday, 19 October 2012
कठिन डगर
कठिन डगर है लम्बा रस्ता दूर हमे अब जाना है
दूर है लेकिन फिर भी हमको मंजिल को तो पाना है
पथरीली है जमीन अभी तो दूर-दूर ना पानी है
मंजिल को पाकर ही हमको अपनी प्यास बुझानी है
मेहनत की इस धूप में हमको यूँ ही चलते जाना है
दूर है लेकिन फिर भी हमको मंजिल को तो पाना है
Subscribe to:
Comments (Atom)
.jpg)