Wednesday, 24 October 2012

सपनों का सागर

टूटकर सपनो की जंजीर बिखर गई 
जो बनाई थी हमने वो तस्वीर बिखर गई 
बिखरे टुकडो में उम्मीदों की किरण ढूंढ़ते है 
मौत के  अंधेरो में जिंदगी का सबब ढूंढते है 

हवाओं  ने रुख बदला तो अब कोई चाह नहीं 

जहाँ चलना मुमकिन हो ऐसी कोई राह नहीं 

हमारे होंसले जब कुछ यूँ सिमटने लगते है 

सन्नाटो और अंधेरो में जब  हम  भटकने लगते है 
न जाने कहाँ और  किस दुनिया में हम खो जाते है 
खुद को नहीं जान पाते ऐसे अजनबी हो जाते है 

सोचते है कि हर ख्वाब को टूट जाना ही होता है 

खिलने के बाद हर फूल को मुरझाना ही होता है 
खुशबू से जो  अपनी महकाता है और जीवन में रंग भरता है 
मुरझाने के बाद उस फूल को कौन याद करता है 

कुछ इसी  अंदाज  में हम खुद को समझा लेते है 

सच की तस्वीर से ख्वाबो की धूल हटा लेते है  
बस ऐसे ही शिकवो का दौर चला जाता है
फिर बिखरे टुकडो में एक खूबसूरत सपना नजर आता है 

इस सपनो के सागर में हम फिर से उतर जायेंगे 

पता नहीं खुद को फिर धोखा देंगे या किनारों को पा जायेंगे

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