Wednesday, 24 October 2012

सपनों का सागर

टूटकर सपनो की जंजीर बिखर गई 
जो बनाई थी हमने वो तस्वीर बिखर गई 
बिखरे टुकडो में उम्मीदों की किरण ढूंढ़ते है 
मौत के  अंधेरो में जिंदगी का सबब ढूंढते है 

हवाओं  ने रुख बदला तो अब कोई चाह नहीं 

जहाँ चलना मुमकिन हो ऐसी कोई राह नहीं 

हमारे होंसले जब कुछ यूँ सिमटने लगते है 

सन्नाटो और अंधेरो में जब  हम  भटकने लगते है 
न जाने कहाँ और  किस दुनिया में हम खो जाते है 
खुद को नहीं जान पाते ऐसे अजनबी हो जाते है 

सोचते है कि हर ख्वाब को टूट जाना ही होता है 

खिलने के बाद हर फूल को मुरझाना ही होता है 
खुशबू से जो  अपनी महकाता है और जीवन में रंग भरता है 
मुरझाने के बाद उस फूल को कौन याद करता है 

कुछ इसी  अंदाज  में हम खुद को समझा लेते है 

सच की तस्वीर से ख्वाबो की धूल हटा लेते है  
बस ऐसे ही शिकवो का दौर चला जाता है
फिर बिखरे टुकडो में एक खूबसूरत सपना नजर आता है 

इस सपनो के सागर में हम फिर से उतर जायेंगे 

पता नहीं खुद को फिर धोखा देंगे या किनारों को पा जायेंगे

Sunday, 21 October 2012

मंजिल

हदे गमें हस्ती से गुजर क्यों नहीं जाते
                       जीना नहीं आता तो मर क्यों नहीं जाते
मंजिल को पाना है तो तूफ़ान  भी मिलेंगे
                       डर अगर है तो कश्ती से उतर क्यों नहीं जाते

जिंदगी का राज

चेहरे की हंसी से हर गम को छुपाओ
                    बहुत कुछ बोलो मगर कुछ न बताओ 
खुद न रूठो कभी पर सब को मनाओ 
                    यही राज है जिंदगी का बस जीते चले जाओ 

Friday, 19 October 2012

कठिन डगर

कठिन  डगर है लम्बा रस्ता दूर हमे अब जाना है 
दूर है लेकिन फिर भी हमको मंजिल को तो पाना है 
पथरीली है जमीन अभी तो दूर-दूर ना पानी है 
मंजिल को पाकर ही हमको  अपनी प्यास बुझानी है 
मेहनत की इस धूप में हमको यूँ ही चलते जाना है 
दूर है लेकिन फिर भी हमको मंजिल को तो पाना है